UP News: कभी-कभी जिंदगी में ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। घर और जमीन हर इंसान के लिए सबसे कीमती संपत्ति होती है, लेकिन सोचिए अगर मेहनत से खरीदी गई आपकी जमीन अचानक किसी और के नाम हो जाए तो कैसा लगेगा? ठीक ऐसा ही मामला हाल ही में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आया है, जिसने सबको हैरान कर दिया।
लखनऊ में फर्जीवाड़े से प्लॉट अपने नाम कराए
मामला कानपुर के प्रोफेसर महेंद्र मित्तल से जुड़ा है। महेंद्र ने बख्शी का तालाब इलाके में अपनी पत्नी शैलजा के साथ मिलकर दो प्लॉट खरीदे थे। लेकिन कुछ समय बाद उन्हें एक परिचित का फोन आया और पता चला कि उन्हीं प्लॉट्स पर दूसरे लोग काम कर रहे हैं। पहले तो महेंद्र को विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन जब उन्होंने लखनऊ आकर सच्चाई देखी तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके दोनों प्लॉट फर्जी आधार कार्ड और नकली दस्तावेज़ों के ज़रिये किसी और के नाम दर्ज हो चुके थे।
पुलिस की जांच में उजागर हुआ संगठित गिरोह
महेंद्र ने इस धोखाधड़ी को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। बीकेटी पुलिस की जांच में सामने आया कि अमीनाबाद निवासी संजय कुमार सोनी ने फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर ये जमीन अपने नाम कराई थी। रजिस्ट्री में प्रतापगढ़ के राहुल सिंह और लखनऊ के अनिल सिंह को गवाह बनाया गया था। यहां तक कि शैलजा के नाम पर भी फर्जी आधार कार्ड लगाया गया। इस पूरे खेल में संगठित गिरोह के शामिल होने की बात कही जा रही है।
सब रजिस्ट्रार कार्यालय की भूमिका पर सवाल
महेंद्र का कहना है कि जब रजिस्ट्री में उनकी और उनकी पत्नी की साफ तस्वीरें मौजूद थीं, तो फिर सब रजिस्ट्रार कार्यालय ने ठीक से जांच क्यों नहीं की? अगर वहां सही तरीके से सत्यापन होता तो यह धोखाधड़ी संभव ही नहीं थी। यही कारण है कि अब सब रजिस्ट्रार कार्यालय की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
प्रोफेसर ने दी एक और रजिस्ट्री की जानकारी
मामले की गंभीरता यहीं खत्म नहीं होती। महेंद्र ने पुलिस को एक और रजिस्ट्री की कॉपी दी, जिसमें फिर से आरोपी संजय सोनी गवाह बना हुआ था। इस बार उसने अपना नाम बदलकर अलग पहचान पेश की। इससे साफ होता है कि पूरा गिरोह लंबे समय से इस तरह की जमीन हड़पने की साजिश कर रहा है।
जमीन की सुरक्षा अब भी सवालों में
इस घटना ने आम लोगों के दिलों में डर पैदा कर दिया है। अगर पढ़े-लिखे और जागरूक व्यक्ति की जमीन भी फर्जी कागजों से किसी और के नाम हो सकती है, तो आम जनता कितनी असुरक्षित है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। लोगों के मन में अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर जमीन-जायदाद की सुरक्षा के लिए कितनी जिम्मेदारी से काम हो रहा है और क्या कानून इस तरह की ठगी से मालिकों को बचा पाएगा?
डिस्क्लेमर: यह खबर विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। यहां दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल पाठकों तक खबर पहुंचाना है। किसी भी प्रकार के निवेश या संपत्ति खरीदने से पहले संबंधित विभाग और विशेषज्ञों से सलाह अवश्य लें।
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