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DAP and Urea New Rates 2025: किसानों को मिली बड़ी राहत, अब सस्ती दरों पर मिलेगी खाद

On: October 11, 2025 7:24 PM
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DAP and Urea New Rates 2025

DAP and Urea New Rates 2025: खेती हमारे देश की आत्मा है। भारत की मिट्टी, किसान की मेहनत और प्रकृति का साथ ही हमारे अन्नदाता की पहचान है। हर साल सरकार किसानों की मदद के लिए नई योजनाएं और नीतियां लाती है ताकि उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके और खेती का खर्च कम हो सके। वर्ष 2025 में सरकार ने किसानों के लिए एक और बड़ी राहत की घोषणा की है — डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) और यूरिया के नए रेट जारी कर दिए गए हैं। यह फैसला किसानों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए लिया गया है ताकि उन्हें महंगी खादों से कुछ राहत मिल सके।

किसानों की राहत के लिए सरकार का बड़ा कदम

पिछले कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में खादों की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इसका असर भारत जैसे कृषि प्रधान देश पर भी पड़ा, जिससे खाद की कीमतें बढ़ गईं और किसानों की लागत बढ़ने लगी। सरकार ने किसानों की इस परेशानी को गंभीरता से लेते हुए डीएपी और यूरिया पर सब्सिडी जारी रखी है, ताकि किसान सस्ती दरों पर खाद खरीद सकें और फसल लागत को कम कर सकें।

कृषि मंत्रालय और उर्वरक विभाग ने स्पष्ट किया है कि हर साल की तरह इस बार भी किसानों को रबी सीजन की तैयारी के लिए राहत दी जा रही है। यह निर्णय खेती को लाभदायक और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

DAP and Urea New Rates 2025

डीएपी और यूरिया की भूमिका फसलों में क्यों जरूरी है

डीएपी यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट पौधों के लिए अत्यंत आवश्यक खाद है। यह फॉस्फोरस और नाइट्रोजन दोनों पोषक तत्व प्रदान करती है, जो जड़ों को मजबूत बनाते हैं और फसल के शुरुआती विकास में मदद करते हैं।
वहीं यूरिया फसल को नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा देती है, जिससे पौधों की बढ़वार तेज होती है और फसल की गुणवत्ता में सुधार आता है। भारत में इन दोनों खादों की मांग हर मौसम में बनी रहती है, क्योंकि यह गेहूं, धान, मक्का और कई अन्य फसलों के लिए जरूरी होती हैं।

डीएपी और यूरिया के नए रेट 2025 में स्थिर

वर्ष 2025 में सरकार ने किसानों के लिए एक राहत भरा फैसला लिया है। सरकार ने घोषणा की है कि डीएपी की बोरी लगभग ₹1350 (50 किलो) और यूरिया की बोरी लगभग ₹266 में किसानों को उपलब्ध कराई जाएगी।
इन दरों को पिछले सालों की तुलना में स्थिर रखा गया है, ताकि किसानों पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े। यह कदम अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के बीच किसानों को बचाने के लिए लिया गया है।

केंद्र सरकार ने इस दर को बनाए रखने के लिए उर्वरक कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी में इजाफा किया है। यानी, बाजार में चाहे कीमतें बढ़ जाएं, किसान को खाद तय दर पर ही मिलेगी — बाकी अंतर सरकार खुद वहन करेगी।

राष्ट्रीय उर्वरक सब्सिडी योजना से मिलेगा लाभ

डीएपी और यूरिया की दरें स्थिर रखने के पीछे सरकार की राष्ट्रीय उर्वरक सब्सिडी योजना (National Fertilizer Subsidy Scheme) का बड़ा योगदान है। इस योजना के तहत सरकार उर्वरक कंपनियों को वित्तीय सहायता देती है ताकि वे खाद को नियंत्रित दरों पर किसानों तक पहुंचा सकें।
इसमें डीएपी के साथ-साथ एमओपी (म्यूरेट ऑफ पोटाश), एनपीके जैसे अन्य खाद भी शामिल हैं। इसका मुख्य उद्देश्य किसानों की उत्पादन लागत को घटाना और कृषि क्षेत्र को अधिक लाभकारी बनाना है।

किसानों को मिलने वाले फायदे

नए रेट लागू होने से किसानों को खेती की लागत में लगभग 10 से 15 प्रतिशत तक की राहत मिलेगी। यह राहत छोटे और मध्यम वर्ग के किसानों के लिए बहुत बड़ी मदद साबित होगी।
रबी सीजन में गेहूं, सरसों और चना जैसी फसलों की बुवाई सस्ती होगी और किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद मिल सकेगी।
इसके अलावा, स्थिर दरों से कालाबाजारी की संभावना भी कम होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।

डिजिटल वितरण प्रणाली से बढ़ेगी पारदर्शिता

सरकार ने राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं कि वे अधिकृत विक्रेताओं और उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से खाद की आपूर्ति सुनिश्चित करें।
अब कई राज्यों में डिजिटल वितरण प्रणाली भी लागू की जा रही है, जहां किसान अपने आधार कार्ड और मोबाइल नंबर के जरिए उर्वरक खरीद सकते हैं। इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और किसानों को सटीक दाम पर खाद मिलेगी।

निष्कर्ष

वर्ष 2025 में डीएपी और यूरिया के नए रेट जारी होना किसानों के लिए एक राहत भरी खबर है। सरकार की सब्सिडी नीति और मूल्य नियंत्रण ने यह साबित किया है कि कृषि को सशक्त बनाने की दिशा में सरकार लगातार काम कर रही है।
यदि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार स्थिर रहता है, तो किसानों को और भी ज्यादा फायदा मिलेगा। यह कदम न केवल खेती को लाभकारी बनाएगा बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।

डिस्क्लेमर:

इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न सरकारी घोषणाओं और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। पाठक किसी भी निर्णय से पहले आधिकारिक स्रोतों या स्थानीय कृषि विभाग से सत्यापन अवश्य करें।

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Rishant Verma

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