Thamma Review: कभी-कभी सिनेमा हमें डराते-डराते हंसाने की कोशिश करता है, और वही कोशिश एक बार फिर Maddock Films लेकर आई है अपनी नई हॉरर-कॉमेडी ‘थम्मा’ के साथ। ‘स्त्री’, ‘भेड़िया’ और ‘मुंज्या’ जैसी फिल्मों से इस बैनर ने इस जॉनर को नई जान दी थी, लेकिन इस बार ऐसा लगता है जैसे कहानी से ज़्यादा ध्यान अपने देसी ‘सुपरनैचुरल यूनिवर्स’ को बनाए रखने पर दिया गया है।
कहानी जो पौराणिकता और आधुनिकता के बीच अटक गई
‘थम्मा’ की कहानी हमें एक अनोखी दुनिया में ले जाती है, जहां इंसान और पिशाच (बेताल) एक साथ रहते हैं, लेकिन उनके बीच का संतुलन लालच और स्वार्थ के कारण बिगड़ता जा रहा है। निर्देशक आदित्य सर्पोतदार ने हिंदू पौराणिक कथाओं से प्रेरित होकर इस फिल्म की नींव रखी है।
फिल्म का नायक आलोक गोयल (आयुष्मान खुराना) एक पत्रकार है जो अंधविश्वास और रहस्यमयी कहानियों पर रिपोर्ट करता है। लेकिन एक दिन जंगल में उसका सामना होता है एक जंगली भालू से, और वहीं उसकी ज़िंदगी बदल जाती है। घायल आलोक को बचाती है ताड़का (रश्मिका मंदाना), एक ऐसी लड़की जिसके सीने में दिल नहीं धड़कता। धीरे-धीरे पता चलता है कि आलोक एक ऐसे कबीले में पहुंच गया है जहां के अपने ही नियम हैं, और उन नियमों को तोड़ने की सजा है ‘थम्मा’ – नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का रहस्यमयी किरदार जो विभाजन के समय से एक गुफा में कैद है।
इंसानी मोहब्बत या राक्षसी वासना?
आलोक और ताड़का का रिश्ता फिल्म की आत्मा है। जब वह आलोक के साथ शहर आती है और ‘तारीका’ बन जाती है, तो समाज के नियमों, परिवार की परंपराओं और इंसानी पूर्वाग्रहों से जूझती है। आलोक का पिता (परेश रावल) उसे ‘हनी ट्रैप’ समझता है, जबकि मां (गीता अग्रवाल शर्मा) उसकी अजीब आदतों से परेशान रहती है। ये हिस्से फिल्म में मानवीय भावनाओं और हास्य का अच्छा मिश्रण बनाते हैं।
लेकिन जैसे ही कहानी आगे बढ़ती है, आलोक खुद एक ‘ब्लड सकिंग’ प्राणी बनने लगता है और यहीं से शुरू होती है उसकी असली जंग — क्या वह अपनी इंसानियत बचा पाएगा या बेताल बनकर हमेशा के लिए खो जाएगा?
कमजोर शुरुआत लेकिन मजबूत दूसरा भाग
फिल्म का पहला हाफ थोड़ा बिखरा हुआ महसूस होता है। मज़ाक, हॉरर और ड्रामा – सब कुछ जैसे किसी मशीन से निकला हो। डराने वाले सीन उतने असरदार नहीं हैं, रोमांस में गहराई की कमी है, और ह्यूमर कई बार जबरदस्ती लगता है।
लेकिन इंटरवल के बाद कहानी में रफ्तार आती है। निर्देशक आदित्य सर्पोतदार दूसरी छमाही में कहानी को भावनाओं और उद्देश्य से भर देते हैं। जब फिल्म ‘अंदर-बाहर’ के भेद, स्वीकार्यता और ‘बेलॉन्गिंग’ की भावना को दिखाती है, तब उसका दिल दर्शकों से जुड़ता है। इसी समय सचिन-जिगर और अमिताभ भट्टाचार्य का गीत “रहें ना रहें हम” दिल को छू जाता है।
एक्टिंग और यूनिवर्स का जादू
आयुष्मान खुराना यहां अपने हरफनमौला इमेज से बाहर निकलने की कोशिश करते दिखते हैं, जबकि रश्मिका मंदाना की मासूमियत और रहस्य का मिश्रण उनके किरदार को जीवंत बनाता है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी अपने अंदाज़ में ‘थम्मा’ को खतरनाक और दिलचस्प दोनों बना देते हैं।
दूसरे भाग में वरुण धवन (भेड़िया के रूप में कैमियो) और सत्यराज (मुंज्या के एक्सॉर्सिस्ट) की मौजूदगी से Maddock Universe एक साथ जुड़ता दिखता है। ‘पंचायत’ फेम फै़सल मलिक और अभिषेक बनर्जी फिल्म में नैचुरल ह्यूमर का रंग भरते हैं, जिससे फिल्म का क्लाइमेक्स रोमांचक बन जाता है।
निष्कर्ष
‘थम्मा’ एक खूबसूरत विचार पर बनी फिल्म है जो पौराणिकता, आधुनिकता और सामाजिक टिप्पणी को एक साथ लाने की कोशिश करती है। लेकिन यह कोशिश शुरू में ठंडी पड़ जाती है। फिर भी, जब कहानी अपने दिल की बात कहती है — तब यह दर्शकों को छू जाती है। Maddock Films का यह प्रयास भले ही ‘स्ट्री’ और ‘भेड़िया’ जितना परफेक्ट नहीं है, लेकिन इसका दूसरा हिस्सा दिखाता है कि भारतीय हॉरर-कॉमेडी अब भी जिंदा है, बस उसे थोड़ा और सच्चाई और सादगी की ज़रूरत है।
डिस्क्लेमर:
इस लेख में दी गई जानकारी फिल्म की कहानी और समीक्षा पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या धार्मिक भावना को आहत करना नहीं है। यह सिर्फ मनोरंजन और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए लिखा गया है।
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